Daily Readings
Liturgical Year C, Cycle I
Twenty‑second Sunday in Ordinary Time
दैनिक पाठ:
पहला पाठ: प्रवक्ता-ग्रन्थ 3:17-18, 20, 28-29
स्तोत्र: स्तोत्र ग्रन्थ 68:4-5, 6-7, 10-11
दूसरा पाठ: इब्रानियों 12:18-19, 22-24
सुसमाचार : सन्त लूकस 14:1, 7-14
माता मरियम की माला विनती: महिमा के पाँच भेद
Daily Readings
वर्ष का बाईसवाँ सप्ताह, इतवार - वर्ष C
पहला पाठ: प्रवक्ता-ग्रन्थ 3:17-18, 20, 28-29
भंजन: स्तोत्र ग्रन्थ 68:4-5, 6-7, 10-11
दूसरा पाठ: इब्रानियों के नाम पत्र 12:18-19, 22-24
सुसमाचार: सन्त लूकस 14:1, 7-14
First Reading
प्रवक्ता-ग्रन्थ 3:17-18, 20, 28-29
"नम्र बन जाओ और प्रभु तुम पर दयादृष्टि करेगा।"
हे पुत्र ! नम्रता से अपना व्यवसाय करो और लोग तुम्हें दानशील व्यक्ति से भी अधिक प्यार करेंगे। तुम जितने अधिक बड़े हो, उतने ही अधिक नम्र बनो इस प्रकार तुम प्रभु के कृपापात्र बन जाओगे। प्रभु का सामर्थ्य अत्यधिक महान् है, किन्तु वह विनम्र लोगों की श्रद्धांजलि स्वीकार करता है। अहंकारी के रोग का कोई इलाज नहीं है, क्योंकि बुराई ने उस में जड़ पकड़ ली है। समझदार मनुष्य दृष्टान्तों पर विचार करता है। जो कान लगा कर सुनता है, वह मुनि को प्रिय है।
प्रभु की वाणी।
Responsorial Psalm
स्तोत्र ग्रन्थ 68:4-5, 6-7, 10-11
अनुवाक्य: हे प्रभु ! तूने दयापूर्वक दरिद्रों को घर दिलाया है।
धर्मी ईश्वर के सामने आनन्द मनाते और प्रफुल्लित हो कर नृत्य करते हैं। "ईश्वर का गीत गाओ और उसके आदर में बाजा बजाओ। ईश्वर के सामने प्रफुल्लित हो कर आनन्द मनाओ।"
अनुवाक्य: हे प्रभु ! तूने दयापूर्वक दरिद्रों को घर दिलाया है।
ईश्वर अपने मंदिर में निवास करता है, वह अनाथों का पिता है और विधवाओं का रक्षक। वह निर्वासितों को आवास देता और बंदियों को छुड़ा कर आनन्द प्रदान करता है।
अनुवाक्य: हे प्रभु ! तूने दयापूर्वक दरिद्रों को घर दिलाया है।
हे ईश्वर ! तूने भरपूर पानी बरसा कर अपनी थकी-माँदी प्रजा को नवजीवन प्रदान किया। तेरी प्रजा ने वहाँ अपना घर बना लिया है और तू वहाँ दयापूर्वक दरिद्रों का भरण-पोषण करता है।
अनुवाक्य: हे प्रभु ! तूने दयापूर्वक दरिद्रों को घर दिलाया है।
Second Reading
इब्रानियों के नाम पत्र 12:18-19, 22-24
"आप लोग सियोन पर्वत, जीवन्त ईश्वर के नगर, स्वर्गीय येरुसालेम के पास पहुँच गये हैं।"
आप लोग ऐसे पर्वत के निकट नहीं पहुँचे हैं, जिसे आप स्पर्श कर सकते हैं। यहाँ न तो सिनाई पर्वत की धधकती अग्नि है, और न काले बादल, न घोर अंधकार, बवण्डर, तुरही का निनाद और न बोलने वाले की ऐसी वाणी, जिसे सुन कर इस्राएली विनय करते थे कि वह फिर हम से कुछ न कहे। आप लोग सियोन पर्वत, जीवन्त ईश्वर के नगर, स्वर्गीय येरुसालेम के पास पहुँच गये हैं, जहाँ लाखों स्वर्गदूत, स्वर्ग के पहले नागरिकों का आनन्दमय समुदाय, सबों का न्यायकर्त्ता ईश्वर, धर्मियों की पूर्णता प्राप्त आत्माएँ, और नवीन विधान के मध्यस्थ येसु विराजमान हैं, जिनका छिड़काया हुआ रक्त हाबिल के रक्त से कहीं अधिक कल्याणकारी है।
प्रभु की वाणी।
Gospel
सन्त लूकस 14:1, 7-14
"जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जायेगा।"
किसी विश्राम के दिन येसु एक प्रमुख फ़रीसी के यहाँ भोजन करने गये। वे लोग उनकी निगरानी कर रहे थे। येसु ने अतिथियों को मुख्य मुख्य स्थान चुनते देख कर उन्हें यह दृष्टान्त सुनाया, "विवाह में निमंत्रित होने पर सब से अगले स्थान पर मत बैठो। कहीं ऐसा न हो कि तुम से प्रतिष्ठित कोई अतिथि निमंत्रित हो और जिसने तुम दोनों को निमंत्रण दिया है, वह आ कर तुम से कहे, 'इन्हें अपनी जगह दीजिए' और तुम्हें लज्जित हो कर सब से पिछले स्थान पर बैठना पड़े। परन्तु जब तुम्हें निमंत्रण मिले, तो जा कर सब से पिछले स्थान पर बैठो जिससे निमंत्रण देने वाला आ कर तुम से यह कहे, 'बंधु, आगे बढ़ कर बैठिए'; इस प्रकार सभी अतिथियों के सामने तुम्हारा सम्मान होगा। क्योंकि जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जायेगा"। फिर येसु ने अपने निमंत्रण देने वाले से कहा, "जब तुम दोपहर या शाम का भोज दो, तो न तो अपने मित्रों को बुलाओ और न अपने भाइयों को, न अपने कुटुम्बियों को और न धनी पड़ोसियों को; कहीं ऐसा न हो कि वे भी तुम्हें निमंत्रण दे कर बदला चुका दें। पर जब तुम भोज दो तो कंगालों, लूलों, लँगड़ों और अंधों को बुलाओ। तुम धन्य होगे कि बदला चुकाने के लिए उनके पास कुछ नहीं है, क्योंकि धर्मियों के पुनरुत्थान के समय तुम्हारा बदला चुका दिया जायेगा।"
प्रभु का सुसमाचार।